आज वैश्विक अर्थव्यवस्था एक अनिश्चित और जटिल दौर से गुजर रही है। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव, बदलते नियम और भरोसे का अभाव इस अनिश्चितता को और गहरा रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे उभरते हुए राष्ट्र के लिए केवल निर्यात पर निर्भर रहकर आर्थिक प्रगति की गति को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है। वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव के बीच भारत को अपनी घरेलू मांग को मजबूत करने और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में, भारतीय निजी क्षेत्र, विशेष रूप से बड़ी कंपनियाँ, जिन्हें ‘भारतीय पूंजी’ के रूप में जाना जाता है, देश की आर्थिक प्रगति में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
घरेलू निवेश की कमी: एक गंभीर चुनौती
भारत सरकार ने आर्थिक विकास को गति देने के लिए आधारभूत संरचना पर अभूतपूर्व निवेश किया है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह और डिजिटल ढांचे पर लाखों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (PLI) और सरलीकृत कर नीतियों के माध्यम से सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया है। इन प्रयासों का उद्देश्य निजी कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि सरकारी और निजी निवेश मिलकर अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक ले जाए।
हालाँकि, वास्तविकता इसके विपरीत है। भारतीय कंपनियाँ रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं और उनके पास पर्याप्त पूंजी उपलब्ध है, फिर भी वे भारत में नए कारखाने स्थापित करने, उत्पादन बढ़ाने या विस्तार करने में संकोच कर रही हैं। इसके बजाय, कई कंपनियाँ अपनी पूंजी को विदेशों में निवेश करने में अधिक रुचि दिखा रही हैं। यह स्थिति उस किसान के समान है जो अपने खेत को उपेक्षित छोड़कर पड़ोसी के खेत में संसाधन लगाए। जब तक निजी क्षेत्र भारत में सक्रिय और बड़े पैमाने पर निवेश नहीं करता, तब तक देश की आर्थिक क्षमता पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाएगी।
घटती क्रय शक्ति और कमजोर घरेलू बाजार
किसी भी अर्थव्यवस्था की ताकत उसकी जनता की क्रय शक्ति पर निर्भर करती है। जब लोगों के पास आय होती है, तब वे बाजार में खरीदारी करते हैं, जिससे कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन मिलता है। भारत का विशाल घरेलू बाजार उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन हाल के रुझान इस ताकत को कमजोर कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में, भारतीय कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ा है, लेकिन कर्मचारियों की वेतन वृद्धि इस गति से मेल नहीं खा रही है। कई क्षेत्रों में वेतन स्थिर है या नगण्य वृद्धि हुई है। इससे आय असमानता बढ़ रही है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव यह है कि मध्यम और निम्न-आय वर्ग की क्रय शक्ति सीमित हो रही है। यदि जनता की खरीदने की क्षमता नहीं बढ़ेगी, तो कंपनियाँ अपने उत्पादों और सेवाओं को बेचने के लिए बाजार कहाँ तलाश करेंगी? कंपनियों को यह समझना होगा कि कर्मचारियों को बेहतर वेतन देना केवल सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय नहीं है, बल्कि यह उनके व्यवसाय की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
अनुसंधान और विकास (R&D) में पिछड़ापन: भविष्य की चुनौती
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को केवल तकनीक का उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि तकनीक का सृजक बनना होगा। इसके लिए अनुसंधान और विकास (R&D) में भारी निवेश अपरिहार्य है। दुर्भाग्यवश, भारत इस क्षेत्र में काफी पीछे है। भारत अपनी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 0.7% R&D पर खर्च करता है, जबकि विकसित देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और जापान में यह आँकड़ा 2-4% तक है। इन देशों में R&D का 70% से अधिक हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा वहन किया जाता है, जबकि भारत में इसकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से सरकार पर है।
भारतीय कंपनियाँ R&D में निवेश करने में संकोच करती हैं, क्योंकि यह तत्काल मुनाफे की गारंटी नहीं देता। यह अल्पकालिक दृष्टिकोण देश की दीर्घकालिक प्रगति को बाधित करता है। नवाचार और तकनीकी प्रगति के बिना, भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है। निजी क्षेत्र को R&D में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि भारत न केवल आत्मनिर्भर बने, बल्कि वैश्विक नवाचार में अग्रणी भूमिका निभाए।
भारतीय निजी क्षेत्र के लिए यह समय एक महत्वपूर्ण अवसर है। सरकार ने निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया है, लेकिन इस माहौल का लाभ उठाने की जिम्मेदारी कंपनियों पर है। भारत में निवेश करना, कर्मचारियों की आय बढ़ाना और अनुसंधान व विकास में योगदान देना न केवल राष्ट्रीय हित में है, बल्कि यह कंपनियों के दीर्घकालिक लाभ के लिए भी आवश्यक है। एक अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में, भारत का घरेलू बाजार और उसकी आर्थिक नींव ही सबसे मजबूत आधार हैं। भारतीय कंपनियों को इस आधार को और सुदृढ़ करने के लिए आगे आना होगा, ताकि भारत न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध बने, बल्कि वैश्विक मंच पर एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में उभरे।
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