वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): न्याय प्राप्ति का नया मार्ग Alternative Dispute Resolution

Alternative Dispute Resolution (ADR): A New Path to Justice

Alternative Dispute Resolution (ADR): भारत की न्याय व्यवस्था इस समय मुकदमों के भारी बोझ, न्याय वितरण में लगातार हो रही देरी और संस्थागत जवाबदेही की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, देश की अदालतों में 4.57 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से लगभग 81,768 सर्वोच्च न्यायालय में और 62.9 लाख उच्च न्यायालयों में हैं। यह स्थिति “न्याय में देरी, न्याय से इनकार” की कहावत को चरितार्थ करती है। ऐसे गंभीर परिदृश्य में, वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) एक प्रभावी और व्यावहारिक समाधान के रूप में उभरा है, यह प्रणाली न्याय व्यवस्था पर बोझ को कम करते हुए, त्वरित, सुलभ तथा मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित न्याय प्रदान करने का उद्देश्य रखती है

ADR की अवधारणा और इसका कानूनी आधार

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विवादों का निपटारा पारंपरिक न्यायालयों के बाहर किया जाता है। इसका उद्देश्य है कि पक्ष आपसी संवाद और सहयोग के माध्यम से समाधान तक पहुँचें। यह प्रक्रिया औपचारिक न्याय प्रणाली की तुलना में अधिक सरल, तेज़ और कम खर्चीली होती है। इसमें विभिन्न विधियाँ शामिल हैं, जैसे पंचाट, जिसमें एक निष्पक्ष व्यक्ति दोनों पक्षों की बात सुनकर बाध्यकारी निर्णय देता है; सुलह, जिसमें सलाह के माध्यम से आपसी सहमति से समाधान निकाला जाता है; मध्यस्थता, जिसमें संवाद के ज़रिए पक्षों को समझौते की दिशा में प्रेरित किया जाता है; और लोक अदालतें, जिन्हें जनता का न्यायालय कहा जाता है, जहाँ विवादों का निपटारा त्वरित और आपसी सहमति से किया जाता है।

यह व्यवस्था केवल एक विचार नहीं, बल्कि इसे भारतीय संविधान और कानून का ठोस समर्थन प्राप्त है:

  • अनुच्छेद 39A राज्य को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है, जो ADR की आत्मा है।
  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 89 ADR के चारों रूपों को कानूनी मान्यता प्रदान करती है।
  • मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (संशोधित 2021) विवाद निपटान के लिए 180 दिन की अधिकतम समय-सीमा तय करता है।
  • विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा देता है, जिनके निर्णय अंतिम और अपील रहित होते हैं।
  • मध्यस्थता अधिनियम, 2023 पूर्व-विवाद मध्यस्थता (Pre-litigation Mediation) को प्रोत्साहित करता है ताकि मामले न्यायालय तक पहुँचने से पहले ही सुलझ जाएँ।

न्याय सुधार में ADR की भूमिका और महत्व

ADR भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक संजीवनी की तरह है, जिसके कई महत्वपूर्ण लाभ हैं। सबसे पहला लाभ न्याय में तेजी है, क्योंकि यह वर्षों तक चलने वाले मुकदमों को कुछ ही महीनों में निपटाने की क्षमता रखता है। दूसरा, यह न्यायालयों का बोझ कम करता है, जिससे न्यायाधीश गंभीर आपराधिक और संवैधानिक मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। तीसरा, यह प्रक्रिया कम खर्चीली है, क्योंकि इसमें भारी कोर्ट फीस और वकीलों पर होने वाले लंबे खर्चों से बचाव होता है।

लेकिन इसका सबसे गहरा प्रभाव सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। ADR का केंद्र बिंदु विवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि पक्षों के बीच संबंधों को बचाना है। जैसा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था, “मध्यस्थता सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है, जहाँ संवैधानिक मूल्य समाज में समाहित होते हैं।” लोक अदालतें इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं, जो भारत की पारंपरिक पंचायत न्याय व्यवस्था का आधुनिक रूप हैं। ये त्वरित, सस्ता और सौहार्दपूर्ण न्याय प्रदान करती हैं और अब e-Lok Adalat के माध्यम से डिजिटल रूप में भी न्याय सुलभ करा रही हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य की राह

ADR के महत्व के बावजूद, न्याय प्रणाली की अपनी चुनौतियाँ हैं। भारत न्याय रिपोर्ट (India Justice Report 2025) के अनुसार, उच्च न्यायालयों में 33% और जिला अदालतों में 21% न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में एक न्यायाधीश पर 4,000 से अधिक मामले हैं। यह स्पष्ट है कि केवल ADR पर निर्भर रहने के बजाय एक समग्र सुधार की आवश्यकता है।

ADR को और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • संस्थागत सशक्तीकरण: प्रत्येक जिले में मध्यस्थता केंद्रों और लोक अदालतों को मजबूत किया जाए।
  • अनिवार्यता: नागरिक और वाणिज्यिक मामलों में पूर्व-विवाद मध्यस्थता को अनिवार्य बनाया जाए।
  • डिजिटलीकरण: e-Lok Adalat और ऑनलाइन सुलह जैसे डिजिटल ADR प्लेटफॉर्म का विस्तार किया जाए।
  • जागरूकता: कानूनी साक्षरता अभियानों के माध्यम से जनता को ADR के फायदों के बारे में बताया जाए।
  • न्यायिक सुधार: अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए और बुनियादी ढाँचे में सुधार किया जाए।

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) भारत की उस पुरातन न्याय परंपरा का पुनर्जागरण है, जहाँ पंचायतें विवाद से नहीं, बल्कि संवाद से न्याय करती थीं। यह न केवल न्याय की गति बढ़ाता है, बल्कि समाज में विश्वास, सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों को भी मज़बूत करता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए, ADR ही सच्चे अर्थों में ‘न्याय सबके लिए’ (Justice for All) के लक्ष्य को साकार करने का सबसे सशक्त माध्यम है।

✅ अगर यह जानकारी अच्छी लगी तो Like 👍, Share ❤️ और Inspire 💪 ज़रूर करें

यह भी पढ़ें :-