firecrackers: नई दिल्ली में शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से माफिया उद्योग पर कब्ज़ा कर लेंगे और भोली-भाली जनता को अवैध रूप से अपना माल बेचेंगे।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ माफिया सक्रिय हो गए थे। उन्होंने स्पष्ट किया—“जैसा कि हमने अतीत में देखा है, पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं हो सकता।” अदालत का मानना था कि पटाखा उद्योग में हज़ारों लोग काम करते हैं, अगर बहुत सख़्ती से हर जगह पटाखों पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए, तो यह न तो सही तरीके से लागू हो पाएगी और न ही सबके साथ न्याय कर पाएगी
आजीविका और पर्यावरण दोनों का संतुलन
न्यायालय ने इस मामले में एक “संतुलित दृष्टिकोण” की आवश्यकता पर ज़ोर दिया- ऐसी नीति जो पटाखा उद्योग से जुड़े लोगों के आजीविका के अधिकार और नागरिकों के स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार, दोनों के बीच संतुलन कायम कर सके।
पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए समाधान निकाले और इसमें पटाखा निर्माता तथा विक्रेताओं जैसे सभी हितधारकों को सुने।
हरित पटाखों को छूट
न्यायालय ने उन निर्माताओं को काम जारी रखने की अनुमति दी है जिन्हें राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) और विस्फोटक विभाग (PESO) द्वारा “ग्रीन क्रैकर्स” बनाने की प्रमाणित अनुमति मिली है। हालांकि शर्त यह रखी गई है कि वे निषिद्ध क्षेत्रों में इन्हें बेचने का प्रयास नहीं करेंगे और इसके लिए एक शपथपत्र देंगे।

पूर्व सुनवाई और व्यापक नीति की आवश्यकता
12 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई में ही मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि पटाखों पर यदि प्रतिबंध लगाना है तो वह पूरे देश में समान रूप से लागू होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस उद्योग से जुड़े गरीब लोगों की आजीविका की सुरक्षा पर भी विचार किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया था कि जब दिल्ली जैसे “विशिष्ट” क्षेत्रों को प्रदूषण से राहत दी जा सकती है तो देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले नागरिकों को क्यों नहीं। दरअसल, अप्रैल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री, उत्पादन और निर्माण पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय अदालत ने इसे नागरिकों के स्वच्छ हवा के अधिकार की रक्षा के लिए “पूर्णतः आवश्यक” ठहराया था।
प्रदूषण का बोझ किन पर?
मामले की सहायक अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया था कि यह गलतफहमी है कि प्रदूषण केवल “विशेष वर्ग” को प्रभावित करता है। वास्तव में सबसे अधिक कष्ट तो सड़कों पर रहने वाले मजदूरों और रोज़ाना कमाने-खाने वाले श्रमिकों को उठाना पड़ता है। वहीं, पटाखा उद्योग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेेश्वर ने दलील दी थी कि दिल्ली-एनसीआर में पूर्ण प्रतिबंध के कारण उनके लाइसेंस रद्द किए जा रहे हैं, जबकि उनमें से कुछ की वैधता 2028 तक थी।
इस पूरे विवाद में सर्वोच्च न्यायालय की नई दिशा स्पष्ट करती है कि केवल “प्रतिबंध” समाधान नहीं है। ज़रूरत है ऐसी नीतियों की जो लोगों की रोज़ी-रोटी और पर्यावरणीय संतुलन दोनों का ध्यान रख सके।
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