पराली (stubble) धान, गेहूँ आदि फसलों की कटाई के बाद खेत में बची हुई ठूंठ या डंठल को कहा जाता है। कटाई के बाद किसान जल्दी अगली फसल बोने के लिए इसे जलाकर खेत साफ करते हैं। यह तरीका समय और लागत की दृष्टि से आसान है, परंतु इसका प्रभाव वायु गुणवत्ता पर बहुत नकारात्मक पड़ता है।
पराली जलाने से प्रदूषण की समस्या-
- वायु प्रदूषण: PM2.5, PM10 जैसे कण निकलते हैं, जिससे दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग बनता है।
- स्वास्थ्य पर असर: अस्थमा, सांस की दिक्कत, आंखों में जलन और हृदय रोग बढ़ते हैं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट होते हैं और ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती हैं।
- आर्थिक असर: स्वास्थ्य खर्च, उत्पादकता में गिरावट और सरकार का अतिरिक्त व्यय।
पराली (stubble) जलाने की असली वजहें-
- धान कटाई और गेहूँ बुवाई के बीच समय की कमी
- मशीनों (Happy Seeder, Super SMS) की ऊँची लागत
- मजदूरी महंगी और जागरूकता की कमी

प्रदूषण के अन्य स्रोत
- वाहन प्रदूषण: 30-40%
- उद्योग/पावर प्लांट: 20-25%
- निर्माण स्थलों उत्पन्न धूल: 15-20%
- पराली जलाना: सालाना औसत 5-15%, पर अक्टूबर-नवंबर में 30-40% तक
- घरेलू ईंधन/कचरा जलाना: 5-10%
- प्राकृतिक कारण: 5% से कम
समाधान और सरकारी प्रयास-
- मशीनरी सब्सिडी: Happy Seeder, Straw Reaper पर 50-80% सब्सिडी
- बायो-डीकंपोजर: IARI का घोल, जो पराली को खाद बनाता है
- फसल विविधीकरण: धान की जगह मक्का, दाल जैसी फसलें
- जागरूकता अभियान: पराली के वैकल्पिक उपयोग (चारा, बायो-एनर्जी, कार्डबोर्ड)
- कानूनी सख्ती: CAQM Act के तहत जुर्माना, सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्रवाई पर भी जोर दिया
आगे का रास्ता-
- वाहन प्रदूषण पर नियंत्रण, इलेक्ट्रिक वाहन प्रोत्साहन
- उद्योगों पर निगरानी, क्लीन फ्यूल और टेक्नोलॉजी
- निर्माण स्थलों उत्पन्न धूल पर नियंत्रण
- किसानों को मशीनें और आर्थिक सहायता
- केवल सजा नहीं, सहयोग और समाधान का रास्ता
दिल्ली-एनसीआर की प्रदूषण समस्या केवल पराली जलाने से नहीं, बल्कि एक मिश्रित चुनौती है। समाधान तभी संभव है जब सरकार, किसान, उद्योग और नागरिक मिलकर समग्र नीति और संयुक्त कार्रवाई करें। पराली (stubble) पर सख्ती के साथ अन्य प्रदूषण स्रोतों को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है।
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