हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 को लागू करने के लिये डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025 के प्रारूप पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया आमंत्रित की है।
सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005, भारतीय लोकतंत्र की एक मजबूत नींव है, जो अब्राहम लिंकन के शब्दों में “जनता का शासन, जनता द्वारा, जनता के लिए” के सिद्धांत पर आधारित है। इस कानून का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार के पास मौजूद सभी सूचनाएं मूल रूप से नागरिकों की संपत्ति हैं, और सरकार केवल उनकी अभिरक्षक (कस्टोडियन) है। नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से नौकरशाही को वैधता प्रदान करते हैं, इसलिए सूचनाओं को साझा करना लोकतंत्र की मूल भावना है। हालांकि, हाल ही में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 द्वारा आरटीआई की धारा 8(1)(ज) में किए गए संशोधनों ने इस कानून को “सूचना देने के अधिकार” से “सूचना न देने के अधिकार” की ओर मोड़ दिया है। यह बदलाव पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार-निरोध पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। सरकार का मत है कि व्यक्तिगत डेटा संरक्षण और निजता के अधिकार के साथ सूचना के अधिकार को संतुलित किया जा सके।
आरटीआई (RTI) अधिनियम की मूल संरचना और अपवाद
आरटीआई अधिनियम का मूल सिद्धांत यह है कि सभी सरकारी सूचनाएं नागरिकों के साथ साझा की जानी चाहिए, सिवाय कुछ स्पष्ट अपवादों के। इन अपवादों में राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता की रक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। एक प्रमुख अपवाद धारा 8(1)(ज) है, जो “व्यक्तिगत जानकारी” (पर्सनल इंफॉर्मेशन) से संबंधित है। मूल रूप से यह धारा सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए डिजाइन की गई थी।
इसमें तीन मुख्य शर्तें थीं:
- सार्वजनिक गतिविधि से संबंध: यदि जानकारी किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से जुड़ी नहीं है, तो उसे रोका जा सकता है।
- निजता का अनुचित अतिक्रमण: यदि खुलासा किसी व्यक्ति की निजता पर अनुचित प्रभाव डालता है, तो उसे छिपाया जा सकता है।
- बड़े सार्वजनिक हित का अपवाद: यदि जानकारी का खुलासा बड़े सार्वजनिक हित में आवश्यक है, तो अपवाद लागू नहीं होता।
इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण उपबंध था: “जो सूचना संसद या राज्य विधानमंडल से नहीं रोकी जा सकती, वह किसी नागरिक से भी नहीं रोकी जा सकती।” यह उपबंध एक “एसिड टेस्ट” की तरह कार्य करता था, जो लोक सूचना अधिकारियों (PIO) को मार्गदर्शन देता था कि कौन-सी जानकारी सार्वजनिक है और कौन-सी निजी। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई जानकारी संसद में उपलब्ध है, तो उसे नागरिकों से नहीं छिपाया जा सकता।
यह प्रावधान निजता की परिभाषा की जटिलता को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में कहा गया कि निजता की परिभाषा मामले-दर-मामले विकसित होगी, लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) की सीमाओं के भीतर ही प्रतिबंधित हो सकती है। अनुच्छेद 19(2) में निजता से जुड़े केवल दो आधार हैं: शिष्टता (डीसेंसी) और नैतिकता (मॉरेलिटी)। यानी, यदि कोई जानकारी इनका उल्लंघन नहीं करती, तो उसे साझा किया जाना चाहिए। सरकार नागरिकों से नियमित रूप से जानकारी इकट्ठा करती है (जैसे कर रिटर्न, पेंशन विवरण), और ऐसी जानकारी सामान्यतः सार्वजनिक हित में साझा की जा सकती है, जब तक वह निजता का गंभीर उल्लंघन न करे।

डीपीडीपी (डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण )अधिनियम द्वारा संशोधन: बदलाव की व्याख्या
डीपीडीपी अधिनियम, 2023 ने आरटीआई की धारा 8(1)(ज) को पूरी तरह बदल दिया है। अब यह धारा केवल छह शब्दों तक सीमित है: “व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित कोई भी जानकारी।” इससे पहले की सभी शर्तें, उपबंध और संतुलन हटा दिए गए हैं। यह बदलाव दो मुख्य मुद्दों पर आधारित है
- व्यक्तिगत जानकारी की अस्पष्ट परिभाषा: आरटीआई में “व्यक्तिगत जानकारी” की स्पष्ट परिभाषा नहीं है, लेकिन डीपीडीपी अधिनियम इसे विस्तृत रूप से परिभाषित करता है। डीपीडीपी में “व्यक्ति” (पर्सन) में केवल प्राकृतिक व्यक्ति (इंसान) ही नहीं, बल्कि हिंदू अविभाजित परिवार, फर्म, कंपनी, व्यक्तियों का संघ और यहां तक कि राज्य भी शामिल हैं। यदि इस विस्तृत परिभाषा को अपनाया जाता है, तो लगभग सभी सरकारी सूचनाएं “व्यक्तिगत” हो जाएंगी, क्योंकि हर जानकारी किसी व्यक्ति या संस्था से जुड़ी होती है। उदाहरण के लिए, एक सरकारी अनुबंध की जानकारी किसी कंपनी से जुड़ी होने के कारण रोकी जा सकती है।
- अधिग्रहण का प्रावधान: डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) कहती है कि टकराव की स्थिति में यह अन्य कानूनों को अधिगृहीत (ओवरराइड) करेगा। साथ ही, उल्लंघन पर ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है। इससे पीआईओ डरते हैं कि यदि वे कोई जानकारी साझा करते हैं और वह “व्यक्तिगत” मानी जाती है, तो उन पर भारी दंड लग सकता है। परिणामस्वरूप, वे जानकारी साझा करने से बचेंगे, और आरटीआई “सूचना न देने का अधिकार” (आरडीआई) बन जाएगा।
यह बदलाव डिजिटल युग में और भी खतरनाक है, जहां अधिकांश सरकारी रिकॉर्ड डिजिटल हैं। डीपीडीपी का उद्देश्य डेटा संरक्षण है, लेकिन यह आरटीआई की भावना को कमजोर करता है, क्योंकि आरटीआई को इससे छूट नहीं दी गई।
व्यावहारिक प्रभाव: पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर खतरा
ये संशोधन लोकतंत्र की मूलभूत संरचनाओं पर गहरा प्रभाव डालेंगे:
- पीआईओ की दुविधा: पीआईओ अब जानकारी रोकने को प्राथमिकता देंगे, क्योंकि दंड का भय बड़ा है। इससे 90% से अधिक आरटीआई आवेदन असफल हो सकते हैं।
- भ्रष्टाचार को बढ़ावा: पारदर्शिता भ्रष्टाचार-निरोध का मुख्य हथियार है। नागरिक भ्रष्टाचार के सबसे प्रभावी निगरानीकर्ता होते हैं, लेकिन अब महत्वपूर्ण सूचनाएं रोकी जा सकेंगी। उदाहरण:
- राजस्थान में पेंशनधारकों की जानकारी साझा करने से “भूतिया कर्मचारी” और “फर्जी कार्ड” पकड़े गए थे। अब ऐसी जानकारी “व्यक्तिगत” बताकर छिपाई जा सकती है।
- किसी अधिकारी के हस्ताक्षरित आदेश को भी रोका जा सकता है, जिससे जवाबदेही समाप्त हो जाएगी।
- अन्य संस्थाएं जैसे सतर्कता विभाग, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और लोकपाल पहले से ही विफल साबित हुई हैं; अब नागरिक निगरानी भी कमजोर होगी, जिससे भ्रष्टाचार बिना रोक-टोक बढ़ेगा।
बड़े सार्वजनिक हित का प्रावधान (धारा 8(2)): यह अभी बचा है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका उपयोग दुर्लभ है (1% से कम मामलों में)। पीआईओ को व्यक्ति के नुकसान और सार्वजनिक लाभ का तुलनात्मक मूल्यांकन करना पड़ता है, जो कठिन और जोखिमपूर्ण है। इसलिए, इसे सामान्य सूचना प्राप्ति का आधार नहीं माना जा सकता।
चुनौतियां और जनता की उदासीनता
ये बदलाव “डेटा संरक्षण” के नाम पर आए हैं, इसलिए जनता और मीडिया में पहले जितना रोष नहीं है, जितना आयुक्तों के वेतन-कार्यकाल में बदलाव पर था। लोग सोचते हैं कि “मेरी जानकारी क्यों साझा हो”, लेकिन यह सार्वजनिक हित की अनदेखी है। डीपीडीपी की धारा 8(2) और 44(3) मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर हमला हैं, जो लोकतंत्र पर मूलभूत प्रहार है।
सुझाव: कार्रवाई का आह्वान
इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना चाहिए:
- सार्वजनिक बहस और जनमत निर्माण: मीडिया और नागरिक संगठनों को व्यापक चर्चा शुरू करनी चाहिए।
- राजनीतिक दबाव: चुनावी घोषणापत्रों में राजनीतिक दलों से संशोधनों को पलटने का आश्वासन मांगें।
- कानूनी चुनौती: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर डीपीडीपी द्वारा आरटीआई के अधिग्रहण को चुनौती दें।
- नीतिगत सुधार: आरटीआई को डीपीडीपी से छूट दें, और “व्यक्तिगत जानकारी” की स्पष्ट परिभाषा दें जो केवल प्राकृतिक व्यक्तियों तक सीमित हो।
निष्कर्ष
आरटीआई (RTI) अधिनियम भारतीय लोकतंत्र का एक क्रांतिकारी उपकरण है, जो नागरिकों को सशक्त बनाता है। डीपीडीपी द्वारा किए गए संशोधन इसे कमजोर कर रहे हैं, जिससे पारदर्शिता घटेगी और भ्रष्टाचार बढ़ेगा। यदि नागरिक और मीडिया चुप रहे, तो यह स्वतंत्रता के लिए खतरा है। सामूहिक कार्रवाई से ही इन बदलावों को पलटा जा सकता है। अंततः, एक मजबूत आरटीआई ही जवाबदेह सरकार और स्वस्थ लोकतंत्र की गारंटी है।
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