केरल वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक: प्रावधान, निहितार्थ और चुनौतियाँ Kerala Wildlife (Protection) Amendment Bill

Kerala Wildlife (Protection) Amendment Bill: Provisions, Implications and Challenges

Kerala Wildlife (Protection) Amendment Bill: केरल सरकार द्वारा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में प्रस्तावित संशोधन, राज्य में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर समस्या को उजागर करता है। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण के मौजूदा कानूनी ढाँचे को चुनौती देता है, बल्कि सहकारी संघवाद, पारिस्थितिक संतुलन और प्रशासनिक विवेक जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी एक गंभीर बहस को जन्म देता है

संवैधानिक और संघीय पहलू (Constitutional & Federal Aspects)

  • समवर्ती सूची का विषय: भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘वन’ और ‘वन्यजीवों का संरक्षण’ समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं। इसका अर्थ है कि इस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
  • संघर्ष की स्थिति: अनुच्छेद 254 के अनुसार, यदि किसी समवर्ती सूची के विषय पर राज्य द्वारा बनाया गया कानून, केंद्र के कानून के विरुद्ध होता है, तो केंद्रीय कानून ही मान्य होगा। हालाँकि, यदि राज्य के कानून को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाती है, तो वह उस राज्य में लागू हो सकता है। केरल का यह विधेयक इसी प्रावधान का उपयोग करने का एक प्रयास है।
  • संघीय तनाव: यह विधेयक केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन पर सवाल उठाता है। राज्य का तर्क है कि स्थानीय समस्याओं (जैसे जंगली सुअर का आतंक) से निपटने के लिए उसे अधिक स्वायत्तता की आवश्यकता है, जबकि केंद्र का दृष्टिकोण एक समान राष्ट्रीय संरक्षण नीति बनाए रखना है।

पर्यावरणीय और पारिस्थितिक निहितार्थ (Environmental & Ecological Implications)

  • ‘वर्मिन’ घोषित करने का खतरा: किसी प्रजाति को ‘वर्मिन’ (Vermin) घोषित करने से उसे कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, जिससे उसका अंधाधुंध शिकार हो सकता है। यह कदम किसी प्रजाति की आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और खाद्य श्रृंखला (Food Chain) को भी असंतुलित कर सकता है।
  • मूल कारण की अनदेखी: यह संशोधन मानव-वन्यजीव संघर्ष के लक्षण (Symptom) यानी जानवरों के हमलों पर ध्यान केंद्रित करता है, न कि उसके मूल कारण (Root Cause) पर। संघर्ष का मुख्य कारण मानव बस्तियों का जंगलों और बफर ज़ोन में विस्तार, वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) का अवरुद्ध होना और प्राकृतिक आवासों का विखंडन है।
  • संरक्षण के आधारभूत सिद्धांतों का क्षरण: केंद्रीय अधिनियम की धारा 62 केंद्र सरकार को किसी जानवर को वर्मिन घोषित करने की शक्ति देती है, लेकिन इसका उपयोग बहुत सावधानी से किया जाता है ताकि संरक्षण के लक्ष्य प्रभावित न हों। इस शक्ति को राज्यों को बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार और निगरानी के सौंपना, संरक्षण के दशकों के प्रयासों को कमजोर कर सकता है।
Kerala Wildlife (Protection) Amendment Bill

शासन और प्रशासनिक चुनौतियाँ (Governance & Administrative Challenges)

  • केंद्र की निष्क्रियता और अपारदर्शिता: लेख इंगित करता है कि केरल की निराशा का एक कारण केंद्र सरकार की धीमी और अपारदर्शी निर्णय प्रक्रिया है। राज्यों की मांगों पर समय पर और पारदर्शी तरीके से विचार न करना उन्हें ऐसे एकतरफा कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है।
  • शक्ति का स्थानांतरण बनाम समस्या का समाधान: केवल शक्ति को केंद्र से राज्य में स्थानांतरित कर देने से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। यदि राज्य भी बिना पारदर्शी मानदंडों, वैज्ञानिक डेटा और जवाबदेही के निर्णय लेता है, तो यह केवल “घातक शॉर्टकट” को बढ़ावा देगा।
  • डेटा-आधारित निर्णय की आवश्यकता: किसी भी प्रजाति को मारने की अनुमति देने का निर्णय भावनाओं या राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि विश्वसनीय डेटा, वैज्ञानिक अध्ययन और विशेषज्ञ मूल्यांकन के आधार पर होना चाहिए।

आगे की राह: एक संतुलित दृष्टिकोण (The Way Forward: A Balanced Approach)

मानव-वन्यजीव संघर्ष एक जटिल समस्या है जिसके समाधान के लिए एक बहुआयामी और स्थायी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय आधारभूत सुरक्षा बनाए रखना: वन्यजीव संरक्षण के न्यूनतम राष्ट्रीय मानकों और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं (जैसे CITES) से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
राज्यों का सशक्तीकरण: राज्यों को केवल मारने की शक्ति देने के बजाय, उन्हें गैर-घातक (Non-lethal) उपायों के लिए सशक्त बनाना चाहिए। इसमें शामिल हैं:

  • वैज्ञानिक तरीकों से बाड़ लगाना (जैसे सोलर फेंसिंग)।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems) विकसित करना।
  • फसल बीमा योजनाओं को प्रभावी बनाना और समय पर मुआवजा देना।
  • जागरूकता अभियान चलाना।
    पारदर्शी और वैज्ञानिक प्रक्रिया: ‘वर्मिन’ घोषित करने या किसी खतरनाक जानवर को मारने की प्रक्रिया को स्पष्ट, पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाया जाना चाहिए। इसमें स्थानीय समुदायों, वन्यजीव विशेषज्ञों और प्रशासकों को शामिल किया जाना चाहिए।
    सह-अस्तित्व को बढ़ावा: दीर्घकालिक समाधान सह-अस्तित्व (Co-existence) मॉडल को बढ़ावा देने में निहित है। इको-डेवलपमेंट समितियों (Eco-Development Committees) और संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management) के माध्यम से स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में भागीदार बनाना महत्वपूर्ण है।
    केंद्र-राज्य सहयोग: केंद्र और राज्यों को टकराव के बजाय सहयोग का मार्ग अपनाना चाहिए। एक स्थायी संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए जहाँ राज्य अपनी विशिष्ट समस्याओं को रख सकें और केंद्र समयबद्ध तरीके से वैज्ञानिक सलाह के आधार पर निर्णय ले सके।

केरल का प्रस्तावित संशोधन मानव-वन्यजीव संघर्ष की तात्कालिकता को दर्शाता है, लेकिन इसका समाधान राष्ट्रीय संरक्षण ढांचे को कमजोर करने में नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि संघीय विकेंद्रीकरण (Federal Devolution), संघीय जिम्मेदारी के त्याग (Federal Abdication) में न बदले। एक स्थायी समाधान के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और एक मजबूत केंद्र-राज्य सहकारी तंत्र की आवश्यकता है जो मानव सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण दोनों को समान महत्व दे।

✅ अगर यह जानकारी अच्छी लगी तो Like 👍, Share ❤️ और Inspire 💪 ज़रूर करें

यह भी पढ़ें :-