भारत में डीज़ल के साथ आइसोब्यूटानॉल (Isobutanol) के मिश्रण की तैयारी

Isobutanol

Isobutanol Blending in Diesel: भारत सरकार नवीकरणीय ऊर्जा और नेट ज़ीरो उत्सर्जन 2070 लक्ष्य की दिशा में वैकल्पिक ईंधनों की तलाश कर रही है। अब तक एथेनॉल और पेट्रोल मिश्रण पर अधिक ध्यान था, लेकिन एथेनॉल-डीज़ल मिश्रण असफल रहा। इसी संदर्भ में आइसोब्यूटानॉल को डीजल के साथ मिलाने की संभावना पर अध्ययन हो रहा है। यदि यह सफल होता है तो भारत दुनिया का पहला देश होगा जो डीज़ल- Isobutanol मिश्रण का उपयोग करेगा।

Isobutanol

आइसोब्यूटानॉल क्या है?

  • यह एक अल्कोहलिक यौगिक (C4 अल्कोहल) है।
  • प्राकृतिक शर्करा (गुड़, शीरा, गन्ना रस, अनाज आदि) से विशेष रूप से इंजीनियर्ड माइक्रोब्स द्वारा किण्वन (fermentation) कर बनाया जाता है।
  • यह ज्वलनशील है और पेंट, सॉल्वेंट आदि उद्योगों में प्रयुक्त होता आया है।
  • फ्लैश प्वाइंट एथेनॉल की तुलना में अधिक है, अर्थात एथेनॉल से कम अस्थिर और आग पकड़ने का जोखिम अपेक्षाकृत कम।
  • एथेनॉल की तुलना में डीज़ल के साथ ज्यादा अच्छी तरह घुलमिल जाता है। क्यों एथेनॉल क्यो विकल्प नही
  • एथेनॉल का लो फ्लैश प्वाइंट अत्यधिक ज्वलनशील और सुरक्षा जोखिम।
  • डीज़ल के साथ कम अनुकूलता (miscibility issues)।
  • इसके विपरीत आइसोब्यूटानॉल का व्यवहार अपेक्षाकृत स्थिर है और डीज़ल में बेहतर घुलनशीलता रखता है। कच्चा माल और उत्पादन प्रक्रिया
  • गन्ना रस, शीरा (molasses), अनाज जैसे वही स्रोत जो एथेनॉल उत्पादन में उपयोग होते हैं।
  • किण्वन टैंक में विशेष सूक्ष्मजीव (जिन्हें Isobutanol उत्पादन हेतु तैयार किया गया है)।
  • डिस्टिलेशन प्रक्रिया चलाकर एथेनॉल और आइसोब्यूटानॉल को अलग किया जाता है।
  • उदाहरण: 150 KLPD क्षमता वाली इकाई आसानी से लगभग 125 KLPD एथेनॉल + 20 KLPD आइसोब्यूटानॉल बना सकती है। फायदे

डीज़ल में बेहतर मिश्रण (ethanol की तुलना में)।
फ्लैश प्वाइंट अधिक सुरक्षा ज्यादा।
उत्सर्जन में कमी जैसे ग्रीनहाउस गैस।
कच्चे माल में समानता मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर में छोटे बदलाव।
आयात प्रतिस्थापन और किसानों को अतिरिक्त लाभ (गन्ने से अधिक उपयोग)।

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चुनौतियाँ / नुकसान

कम सिटेन संख्या (Cetane Number): डीज़ल की तुलना में काफी कम, जिससे दहन गुणवत्ता घटेगी।
परिणाम इग्निशन में देरी, डीज़ल नॉक, इंजन को नुकसान, पावर कम होना।
10% से अधिक मिश्रण इंजनों पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
सिटेन वैल्यू सुधारने हेतु एडिटिव्स की आवश्यकता, जिससे लागत बढ़ेगी।

आइसोब्यूटानॉल डीज़ल-मिश्रण के लिए एथेनॉल से बेहतर विकल्प दिखाई देता है। यह सुरक्षा और मिश्रण दृष्टिकोण से अनुकूल है, साथ ही किसानों और चीनी मिलों के लिए अतिरिक्त उपयोग विकल्प भी देगा। हालांकि, सिटेन नंबर और लागत संबंधी चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। सीमित प्रतिशत (10% तक) प्रयोग और एडिटिव्स के साथ यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण लक्ष्यों में सहायक हो सकता है।

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