Refugees and Infiltrators: India’s Policy Dilemma : हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने शरणार्थियों और घुसपैठियों के बीच स्पष्ट अंतर करने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह एक वैध चिंता है, लेकिन भारत में इस अंतर को निष्पक्ष रूप से लागू करने के लिए एक सुसंगत और व्यापक कानूनी ढांचे की कमी है। इसी संदर्भ में, भारत की शरणार्थी नीति से जुड़े विभिन्न आयामों का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत में शरणार्थियों की कानूनी स्थिति : एक अस्पष्ट तस्वीर
भारत, जिसने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कन्वेंशन और 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, के पास “शरणार्थी” को परिभाषित करने वाला कोई एकल, व्यापक कानून नहीं है। इस कारण, शरण चाहने वालों सहित सभी विदेशी नागरिकों से निपटने के लिए पुराने कानूनों जैसे विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1920 का उपयोग किया जाता रहा है।
हालांकि अप्रैल 2025 से लागू हुआ नया “आव्रजन और विदेशी अधिनियम” कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाता है, लेकिन यह भी शरणार्थियों की विशिष्ट स्थिति को परिभाषित नहीं करता है। इस कानूनी शून्यता का परिणाम यह होता है कि बिना दस्तावेज़ वाले किसी भी व्यक्ति को “अवैध प्रवासी” या “घुसपैठिया” माना जा सकता है, भले ही वह उत्पीड़न से भागकर आया एक वास्तविक शरणार्थी ही क्यों न हो। यह स्थिति अधिकारियों को मनमाने ढंग से कार्रवाई करने का अवसर देती है और निर्दोष शरणार्थियों के उत्पीड़न का खतरा पैदा करती है।
वो पूछते हैं कि शरणार्थी और घुसपैठिए में क्या अंतर है…
— Gaurav Bhatia गौरव भाटिया 🇮🇳 (@gauravbhatiabjp) October 10, 2025
जो लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए भारत की शरण में आते हैं, वे शरणार्थी हैं।
हिंदू, बौद्ध, सिख और ईसाई; ये सभी ऐसे लोग हैं जो धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए आए हैं।
लेकिन जो लोग किसी धार्मिक उत्पीड़न का शिकार नहीं हुए हैं… pic.twitter.com/bdnotWtpe6
नीतिगत भेदभाव और असंगत दृष्टिकोण
एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति के अभाव में, भारत सरकार का दृष्टिकोण अक्सर मामले-दर-मामले के आधार पर बदलता रहा है, जिससे विभिन्न शरणार्थी समूहों के साथ अलग-अलग व्यवहार होता है।
- तिब्बती बनाम श्रीलंकाई तमिल: जहां भारत ने लगभग 63,000 तिब्बती शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए एक नीति बनाई, वहीं दशकों से भारत में रह रहे लगभग 90,000 श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों के लिए कोई ऐसा दस्तावेज़ मौजूद नहीं है। यह नीतिगत असंगति को उजागर करता है।
- नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA): इस कानून का उद्देश्य बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए छह धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना था। हालांकि, धार्मिक आधार पर भेदभाव करने और इसमें मुस्लिम, श्रीलंकाई तमिल और रोहिंग्या जैसे उत्पीड़ित समूहों को शामिल न करने के कारण इसकी कड़ी आलोचना हुई।
- अस्थायी राहत, स्थायी समाधान नहीं: हाल ही में, सरकार ने कुछ श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को आव्रजन कानूनों के दंडात्मक प्रावधानों से छूट दी है। यह एक स्वागत योग्य मानवीय कदम है, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और धर्म-आधारित बहिष्करण की प्रवृत्ति को नहीं बदलता है।
मानवीय सरोकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
किसी भी देश के लिए अपनी सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना सर्वोपरि है। “घुसपैठियों” को लेकर सरकार की चिंता इसी दृष्टिकोण से प्रेरित है। घुसपैठिए देश की सुरक्षा और संसाधनों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में मानवीय संकट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्पीड़न, गृहयुद्ध या नरसंहार से भागकर आने वाले लोग अपराधी नहीं, बल्कि पीड़ित होते हैं। भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की महान परंपरा रही है, जिसने हमेशा जरूरतमंदों को आश्रय दिया है। एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में, भारत को सुरक्षा चिंताओं और मानवीय दायित्वों के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
आगे की राह: एक व्यापक शरणार्थी नीति की आवश्यकता
भारत को इस नीतिगत दुविधा से बाहर निकलने के लिए एक स्थायी और निष्पक्ष समाधान की ओर बढ़ना होगा।
- राष्ट्रीय शरणार्थी कानून का निर्माण: सबसे महत्वपूर्ण कदम एक व्यापक घरेलू शरणार्थी कानून बनाना है। यह कानून “शरणार्थी” की स्पष्ट परिभाषा दे, उनके अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करे, और शरणार्थी का दर्जा निर्धारित करने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करे।
- गैर-भेदभाव का सिद्धांत: यह कानून धर्म, नस्ल, जातीयता या राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी शरणार्थियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों का समावेश: भले ही भारत यूएन कन्वेंशन पर हस्ताक्षर न करे, लेकिन उसे ‘नॉन-रिफाउलमेंट’ (किसी भी शरणार्थी को उस देश में वापस न भेजना जहां उसकी जान को खतरा हो) जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सिद्धांतों को अपने घरेलू कानून में शामिल करना चाहिए।
- निष्पक्ष जांच प्रक्रिया: घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच अंतर करने के लिए एक निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ जांच प्रक्रिया स्थापित की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वास्तविक शरणार्थियों को उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
शरणार्थियों और घुसपैठियों के बीच अंतर करना आवश्यक है, लेकिन यह अंतर मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि एक स्पष्ट, सुसंगत और मानवीय कानून के आधार पर किया जाना चाहिए। एक राष्ट्रीय शरणार्थी नीति न केवल भारत को अपने मानवीय दायित्वों को पूरा करने में मदद करेगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा भी प्रदान करेगी। यह भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को बढ़ाएगा और इसे एक जिम्मेदार और करुणामय राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा।
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