Sawalkot Hydroelectric Project: भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर की चेनाब नदी पर प्रस्तावित 1,856 मेगावाट की सावलकोट जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी देने की सिफारिश की है। यह परियोजना रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, विशेषकर तब जब भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित कर दिया है। सावलकोट परियोजना, जो लगभग चार दशकों से रुकी हुई थी, अब भारत की पश्चिमी नदियों के जल संसाधनों के पूर्ण उपयोग की नीति का प्रमुख हिस्सा बन गई है यह घटनाक्रम भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को एकपक्षीय रूप से निलंबित करने के बाद हुआ है, जिससे इस परियोजना को एक गहरा भू-राजनीतिक प्रतीकवाद प्राप्त हुआ है। हालाँकि, इस रणनीतिक महत्व के कारण परियोजना से जुड़े गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रश्नों के अनदेखी होने का खतरा बढ़ गया है। यह लेख सावलकोट परियोजना का एक बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें इसके रणनीतिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।
सावलकोट जलविद्युत परियोजना: एक परिचय
यह परियोजना जम्मू और कश्मीर के रियासी और रामबन जिलों में चेनाब नदी पर प्रस्तावित है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- क्षमता: 1856 मेगावाट।
- बांध का प्रकार: यह एक गुरुत्व बांध (Gravity Dam) है।
- स्वरूप: यद्यपि इसे ‘रन-ऑफ-रिवर’ परियोजना के रूप में वर्णित किया गया है, तथापि इसके द्वारा बनाए जाने वाले 50,000 करोड़ लीटर से अधिक के जलाशय के कारण यह कार्यात्मक रूप से एक भंडारण बांध के करीब है।
- उद्देश्य: बिजली उत्पादन के साथ-साथ क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मज़बूत करना।

परियोजना का बहुआयामी विश्लेषण
भू-राजनीतिक एवं रणनीतिक आयाम
सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद इस परियोजना को आगे बढ़ाना, पश्चिमी नदियों पर अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग करने की भारत की मंशा का एक स्पष्ट संकेत है। इस कदम से भारत को वुल्लर बैराज जैसी अन्य परियोजनाओं को प्रक्रियात्मक बाधाओं के बिना आगे बढ़ाने का अवसर मिला है।
हालाँकि, इस दृष्टिकोण के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता: यह एक तटवर्ती राज्य (riparian state) के रूप में भारत की विश्वसनीयता को कम कर सकता है, जो संधियों का सम्मान करता है।
- कानूनी चुनौतियाँ: पाकिस्तान ने पहले ही इस निलंबन को 1960 की संधि के ढाँचे के तहत चुनौती दी है।
- तृतीय-पक्ष की मध्यस्थता: यदि भारत बिना सहकारी तंत्र के बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाता है, तो भविष्य की वार्ताओं में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का जोखिम बढ़ सकता है, जिसका नई दिल्ली ने हमेशा विरोध किया है।
पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय चिंताएँ
रणनीतिक महत्व के तर्क के आधार पर पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययनों से छूट की मांग की जा रही है, जो कि चिंताजनक है।
- संचयी प्रभाव (Cumulative Impact): चेनाब नदी पर पहले से ही दुलहस्ती, बगलिहार और सलाल जैसी परियोजनाएँ एक “बंपर-टू-बंपर” गलियारा बनाती हैं। सावलकोट इन परियोजनाओं के संचयी पर्यावरणीय प्रभाव को और बढ़ाएगा, जिसे अनदेखा किया जा रहा है।
- पारिस्थितिकीय जोखिम: इस क्षेत्र में तलछट भार (sediment loads) और ढलान की अस्थिरता (slope instability) का जोखिम बढ़ जाएगा।
- वन भूमि का क्षरण: परियोजना के लिए 847 हेक्टेयर वन भूमि के विचलन की आवश्यकता होगी, जिसका स्थानीय जैव-विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव
- लागत वृद्धि: प्रशासनिक अनिश्चितता और मुद्रास्फीति के कारण परियोजना की अनुमानित लागत में ₹9,000 करोड़ की वृद्धि हो चुकी है। NHPC का पिछली हिमालयी परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि का रिकॉर्ड भी चिंता का विषय है।
- विस्थापन और पुनर्वास: इस परियोजना से लगभग 1,500 परिवार विस्थापित होंगे। इसके बावजूद, पुनर्वास लागत कुल व्यय का केवल 0.6% है, जो सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से अपर्याप्त प्रतीत होता है।
आगे की राह
सावलकोट परियोजना एक दोराहे पर खड़ी है, जहाँ रणनीतिक मुखरता और पारिस्थितिकीय विवेक के बीच संतुलन साधना आवश्यक है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
भारत को एक दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए:
पारिस्थितिकीय संयम: रणनीतिक मुखरता के साथ-साथ पारिस्थितिकीय संयम बरतना आवश्यक है। भविष्य की सभी परियोजनाओं के लिए क्षेत्रीय स्तर पर संचयी प्रभाव का अध्ययन और तलछट प्रबंधन प्रोटोकॉल विकसित किए जाने चाहिए।
डेटा पारदर्शिता: जल-संबंधी निगरानी को सुरक्षा जोखिम के बजाय एक विश्वास-बहाली उपाय (Confidence-Building Measure) में बदलना चाहिए। क्षेत्रीय या बहुपक्षीय प्लेटफार्मों के माध्यम से डेटा पारदर्शिता को संस्थागत रूप दिया जा सकता है।
संतुलित दृष्टिकोण: सामरिक स्वायत्तता को पारिस्थितिकीय प्रबंधन के साथ जोड़कर ही इस परियोजना की वास्तविक सफलता सुनिश्चित की जा सकती है।
अंततः, Sawalkot Hydroelectric Project सावलकोट की विरासत इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत इस तथ्य को कितनी गंभीरता से लेता है कि एक सुरक्षित राष्ट्र की नींव एक स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण पर ही रखी जा सकती है।
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