Sir Creek dispute: सर क्रीक, गुजरात के कच्छ और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच स्थित 96 किलोमीटर लंबा एक मुहाना (Estuary) है। यह कच्छ के रण में एक दलदली और निर्जन क्षेत्र है जो अरब सागर में जाकर मिलता है। कभी ‘बाण गंगा’ के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र, औपनिवेशिक काल में एक ब्रिटिश अधिकारी के नाम पर ‘सर क्रीक’ कहलाया। यह क्षेत्र एक बार फिर से सुर्खियों में है, जो इसके विशाल आर्थिक और सामरिक महत्व को रेखांकित करता है।
विवाद की ऐतिहासिक जड़ें Sir Creek dispute
इस क्षेत्र पर विवाद ब्रिटिश शासन काल से ही चला आ रहा है। उस समय, यह पूरा क्षेत्र बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, जिसमें आज का महाराष्ट्र, गुजरात और सिंध शामिल थे। 1947 में विभाजन के बाद, सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बन गया जबकि कच्छ भारत में ही रहा। विवाद का मूल मुद्दा सीमा रेखा का निर्धारण है।
- पाकिस्तान का दावा: पाकिस्तान, 1914 के बॉम्बे सरकार के एक प्रस्ताव का हवाला देते हुए पूरे क्रीक पर अपना दावा करता है। इस प्रस्ताव के अनुसार, सीमा क्रीक के पूर्वी किनारे पर निर्धारित की गई थी, जिसे ‘ग्रीन लाइन’ भी कहा जाता है। यह प्रभावी रूप से पूरे क्रीक को सिंध का हिस्सा बना देता है।
- भारत का तर्क: भारत, 1925 के एक नक्शे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत ‘थालवेग सिद्धांत’ (Thalweg Principle) के आधार पर मध्य-चैनल सिद्धांत की वकालत करता है। थालवेग सिद्धांत के अनुसार, यदि दो देशों के बीच एक नौगम्य जलमार्ग सीमा बनाता है, तो सीमा उस जलमार्ग के सबसे गहरे चैनल के मध्य से होकर गुजरनी चाहिए। भारत का मानना है कि उच्च ज्वार (high tide) के दौरान सर क्रीक नौगम्य हो जाता है, इसलिए सीमा का निर्धारण मध्य-चैनल से होना चाहिए। पाकिस्तान इस तर्क को खारिज करता है और जोर देता है कि यह क्रीक नौगम्य नहीं है।

आर्थिक और सामरिक महत्व
यद्यपि सर क्रीक का प्रत्यक्ष सैन्य महत्व सीमित है, लेकिन इसका आर्थिक महत्व बहुत अधिक है। सर क्रीक में अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण अरब सागर में दोनों देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (Exclusive Economic Zones – EEZs) के सीमांकन को सीधे प्रभावित करेगा।
- अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ): EEZ किसी देश के प्रादेशिक जल से 200 समुद्री मील (लगभग 370.4 किमी) तक फैला होता है, जिसके भीतर उस देश को सभी जीवित और निर्जीव संसाधनों पर अधिकार प्राप्त होता है।
- प्राकृतिक संसाधन: यह क्षेत्र तेल और गैस के विशाल भंडार से समृद्ध माना जाता है। सीमा का निर्धारण महाद्वीपीय शेल्फ (continental shelves) के विभाजन को भी प्रभावित करेगा, जो तेल और गैस की खोज के लिए महत्वपूर्ण है।
- मछली पकड़ने के अधिकार: मछली पकड़ने के अधिकार भी एक संवेदनशील मुद्दा है। दोनों देशों के मछुआरे अक्सर अनजाने में अचिह्नित समुद्री सीमा पार कर जाते हैं और गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।
- सामरिक महत्व: कच्छ की खाड़ी में भारत के दो प्रमुख बंदरगाह – मुंद्रा और कांडला – स्थित हैं, जो इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को और बढ़ाते हैं। इसके अलावा, कच्छ के रण के पाकिस्तानी हिस्से में चीन समर्थित खनन और बिजली परियोजनाओं ने भारत की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि ये नागरिक परियोजनाएं भविष्य में रणनीतिक या सैन्य संपत्ति में बदल सकती हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2 अक्टूबर को एक यात्रा के दौरान पाकिस्तान को चेतावनी दी कि “कराची का एक रास्ता सर क्रीक से होकर भी गुजरता है”, जो इस्लामाबाद को 1965 में लाहौर के पास भारत की बढ़त की याद दिलाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जहाँ भारत ने बातचीत के माध्यम से विवाद को सुलझाने की कोशिश की है, वहीं पाकिस्तान के इरादे संदिग्ध बने हुए हैं। आक्रामकता के किसी भी कृत्य पर एक मजबूत प्रतिक्रिया दी जाएगी जो “इतिहास और भूगोल दोनों को बदल सकती है”।
सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि इस दलदली और सड़क-विहीन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीनी हमले लगभग असंभव हैं। आज बड़ी चुनौती UAVs और ड्रोन से है, जो EEZ में स्थित बंदरगाहों और रिफाइनरियों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को निशाना बना सकते हैं।
Sir Creek dispute: सर क्रीक विवाद अब केवल सीमा रेखा का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री अधिकारों और पाकिस्तान-चीन के संयुक्त रणनीतिक दबाव के जोखिम से भी जुड़ गया है। जनवरी 2007 में एक संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण और उसके बाद हुई वार्ताओं के बावजूद, सीमा के स्थान पर मूल असहमति बनी हुई है। 1972 के शिमला समझौते के कारण, किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप भी संभव नहीं है। इसलिए, यह अनसुलझा विवाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
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