पारंपरिक चिकित्सा का बढ़ता महत्व | The growing importance of traditional medicine

traditional medicine

Importance of traditional medicine: 23 सितम्बर को प्रतिवर्ष आयुर्वेद दिवस मनाने की घोषणा की गयी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया के लगभग 88% देश (194 में से 170) किसी न किसी रूप में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करते हैं। यह केवल स्वास्थ्य-सेवा का साधन नहीं है, बल्कि जैवविविधता संरक्षण, पोषण-सुरक्षा और सतत आजीविका का भी आधार है। विशेषकर विकासशील देशों में जहाँ आधुनिक चिकित्सा तक पहुँचना कठिन है, वहाँ यह किफ़ायती और सुलभ विकल्प प्रदान करती है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  • पारंपरिक चिकित्सा का वैश्विक बाजार 2025 तक लगभग 583 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
  • चीन का Chinese Traditional Medicine उद्योग अकेले ही 122 अरब डॉलर का है।
  • भारत का AYUSH सेक्टर भी लगभग 43 अरब डॉलर का आँका गया है और तेज़ी से बढ़ रहा है।

यह आँकड़े यह दिखाते हैं कि स्वास्थ्य-दर्शन बदल रहा है – केवल बीमारी का इलाज करने से हटकर, रोग की रोकथाम और जीवन-शैली सुधार की ओर ध्यान जा रहा है।

भारत में AYUSH की प्रगति
पिछले एक दशक में AYUSH क्षेत्र ने अभूतपूर्व विकास किया है।

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उद्योगिक विकास: 2014-15 में ₹21,000 करोड़ का राजस्व आज निर्माण क्षेत्र में ₹1.37 लाख करोड़ और सेवा क्षेत्र में ₹1.67 लाख करोड़ तक पहुँचा।
उद्यमिता: 92,000+ MSMEs सक्रिय।
निर्यात: 150+ देशों को $1.5 अरब के उत्पादों का निर्यात।
जागरूकता: NSSO सर्वे (2022-23) में 95% ग्रामीण व 96% शहरी आबादी परिचित; आधे से अधिक लोगों ने उपयोग भी किया।
मान्यता: कई देशों ने आयुर्वेद को औपचारिक चिकित्सा प्रणाली का दर्जा दिया।

वैज्ञानिक व वैश्विक विस्तार

  • AIIA, NIA, CCRAS जैसी संस्थाएँ औषध मानकीकरण व क्लीनिकल परीक्षण कर रही हैं।
  • 25 द्विपक्षीय समझौते, 52 साझेदारियाँ, 39 देशों में 43 सूचना केंद्र, 15 विदेशी विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद चेयर।
  • गुजरात, जामनगर में WHO Global Centre for Traditional Medicine की स्थापना।

प्रासंगिकता

  • आयुर्वेद का दर्शन संतुलन है शरीर-मन, मानव-प्रकृति और उपभोग-संरक्षण के बीच। जीवनशैली रोगों और जलवायु संकट के दौर में यह और अधिक महत्वपूर्ण है। थीम 2025: “Ayurveda for People & Planet”।

चुनौतियाँ

  • वैज्ञानिक प्रमाण व क्लीनिकल शोध की कमी।
  • औषधि मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित उपलब्धता।
  • औषधीय पौधों पर बढ़ता दबाव।

नीतिगत सुझाव

  • अनुसंधान व विकास में निवेश।
  • औषधि गुणवत्ता नियंत्रण।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में AYUSH सेवाएँ।
  • औषधीय पौधों की खेती व संरक्षण।
  • निर्यात और वेलनेस डिप्लोमेसी को प्रोत्साहन।

भारत की पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था केवल स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि टिकाऊ जीवन दृष्टि है। आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर यह वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली का सशक्त स्तंभ बन सकती है।

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