Indian Marriage: हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कानूनी गलियारों में एक पुरानी, लगभग भुलाई जा चुकी अवधारणा को फिर से जीवित कर दिया है। शेली महाजन बनाम एम.एस. भानुश्री बहल मामले में, न्यायालय ने पहली बार किसी पत्नी को अपने पति की प्रेमिका पर “स्नेह के अलगाव” (Alienation of Affection) के लिए हर्जाने का मुकदमा करने की अनुमति दी है। यह फैसला एक कानूनी भूत को जगाने जैसा है, जो अब आधुनिक भारत में रिश्तों, निजता और विवाह की पवित्रता पर नए सवाल खड़े कर रहा है।
क्या है ‘स्नेह का अलगाव’ – एक भूला हुआ कानूनी हथियार?
‘स्नेह का अलगाव’ कॉमन लॉ का एक ‘हार्ट-बाम टॉर्ट’ (दिल को मरहम लगाने वाला कानून) है। सरल शब्दों में, यह एक पति या पत्नी को यह अधिकार देता है कि वह उस तीसरे व्यक्ति पर मुकदमा कर सके, जिसने जानबूझकर उनके वैवाहिक जीवन में दखल देकर उनके साथी का स्नेह और साहचर्य छीन लिया हो।
- अवधारणा: यह इस विचार पर आधारित है कि विवाह केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि एक कानूनी हित भी है, जिसमें प्रेम, साहचर्य और समर्थन पाने का अधिकार शामिल है।
- वैश्विक स्थिति: अमेरिका जैसे देशों में इसे काफी हद तक एक पुराना और अनुपयोगी कानून मानकर खत्म कर दिया गया है, हालांकि कुछ राज्यों में यह आज भी जीवित है।
- भारत में स्थिति: भारत में यह कानून लिखित में नहीं है, पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिनाकिन रावल (2013)’ जैसे मामलों में इसे एक “जानबूझकर किया गया अपकृत्य (intentional tort)” माना है। पर आज तक किसी को हर्जाना नहीं मिला था।
सबसे बड़ा सवाल: क्या यह ‘जोसेफ शाइन केस’ के खिलाफ है?
2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले में व्यभिचार (Adultery) को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था। तब यह तर्क दिया गया था कि यह निजता का मामला है और महिला पति की संपत्ति नहीं है। तो क्या दिल्ली हाईकोर्ट का यह नया फैसला उस ऐतिहासिक निर्णय के खिलाफ है? नहीं, और यहीं इस फैसले की खूबसूरती है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का तर्क और विश्लेषण:
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘जोसेफ शाइन’ वाद में व्यभिचार को आपराधिक दंडनीयता से मुक्त किया गया था, किंतु इसे एक ‘सिविल दोष’ (Civil Wrong) के रूप में यथावत रखा गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी न्यायिक सिद्धांत की व्याख्या करते हुए यह स्थापित किया कि किसी कृत्य को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का आशय उसे सामाजिक या विधिक वैधता प्रदान करना नहीं है।
न्यायालय का तर्क यह है कि जब किसी दोष के लिए उपचार का आपराधिक मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, तो पीड़ित पक्ष के लिए दीवानी उपचार (Civil Remedy) प्राप्त करने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अतः, यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय का उल्लंघन नहीं, अपितु उसकी एक तार्किक परिणति है, जो दीवानी न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।
निर्णय का विधिक महत्व एवं दूरगामी प्रभाव
इस निर्णय का महत्व केवल एक नए मुकदमे की शुरुआत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी विधिक प्रभाव हैं।
सर्वप्रथम, यह वैवाहिक संबंधों में तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से पीड़ित पक्षकार के लिए एक नवीन न्यायिक उपचार (new judicial remedy) की स्थापना करता है। हालांकि, इसके संभावित दुरुपयोग को रोकने हेतु न्यायालय ने कठोर न्यायिक सुरक्षा उपाय भी निर्धारित किए हैं। किसी भी दावे को सिद्ध करने के लिए एक त्रि-स्तरीय परीक्षण अनिवार्य होगा, जिसमें: (i) तीसरे पक्ष का कृत्य जानबूझकर एवं दुर्भावनापूर्ण हो, (ii) उसी कृत्य और वैवाहिक विच्छेद में सीधा कार्य-कारण संबंध (causation) हो, तथा (iii) हुई क्षति का तार्किक मूल्यांकन संभव हो।
इसके अतिरिक्त, यह निर्णय क्षेत्राधिकार (jurisdiction) संबंधी अनिश्चितता को भी समाप्त करता है। न्यायालय ने यह भी साफ कर दिया कि यह मामला पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि एक दीवानी क्षति का मामला है, इसलिए इसकी सुनवाई सिविल कोर्ट में होगी, फैमिली कोर्ट में नहीं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वायत्तता (जोसेफ शाइन केस) और विवाह संस्था की पवित्रता के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाने का प्रयास किया है। यह फैसला कहता है कि भले ही राज्य पति-पत्नी के बेडरूम में दखल देकर किसी को जेल न भेजे, लेकिन विवाह के रिश्ते में जो कानूनी हित निहित हैं, उन्हें कोई तीसरा व्यक्ति नुकसान नहीं पहुंचा सकता। यदि ऐसा होता है, तो पीड़ित पक्ष हर्जाने का हकदार होगा। यह निर्णय आने वाले वर्षों में भारत में पारिवारिक कानूनों और व्यक्तिगत संबंधों की दिशा को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा।
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